भिंडरावाला या पाकिस्तानी एजेंट.
This is a stupid result of stupid comments by a Gurudwara Granthi against the Hindu community in a Sikh Temple. I am not proud of writing it but this is the hatered that I developed during my last visit to a Gurudwara Sahib.
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कितना खौफ है के कोई बोल भी नही सकता कहीं सीख नाराज़ ना हो जाएं.
सिखों ने बहुत कुर्बानियाँ की थी. कहते हैं हिन्दू कौम बुज़दिल है, कौन सी कौम बुज़दिल? आज भी हिन्दुओं में इतनी ताक़त है के वो सीख, बुध, जैन जैसी 10-15 कौमें और तैयार कर दे.
भारत एक ऐसा मुल्क और एक ऐसे फलसफे का नाम जहां पहुंच कर सिकंदर खतम, एक महान धरम इस्लाम का विस्तार रुक गया, इंग्लेंड एक टापू बन कर रह गय.
जिस समय सिखों ने हिन्दुओं की 5000 बेटिओं की लाज बचाई, वो उस समय सीख परिवार की ही थी क्योंके तब तक सीख धरम की नीव ही नहीं रखी गयी थी. यह लड़कियां कहन से कहन ले जाई जा रही थी? अपनी बेटिओं को दूसरों की बेटियाँ कह कर बड़पन दिखाना कहन तक उचित है?
गोबिन्द सिंह भी तो असल में गोबिन्द राय ही थे. कह दो यह भी झूठ है. "धुर की बानी" में धुर तो हिन्दू संस्कृति ही थी और है. हेट स्पीच दुनिया में कामयाब है वो चाहे हिन्दू, मुस्लिम या सिख के खिलाफ हो.
भिंडरावाले ने पाकिस्तान के इशारे पर लाला जगत नारायण मार दिया।
कसूर क्या था ? हिंदी में समाचार पत्र छापने का? यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई किसी सिख को पंजाबी समाचार पात्र पढ़ते देख क़त्ल कर दे. नफ़रत जितनी मर्ज़ी फैलते जाओ, इसका अंत नहीं होता। किन्तु भिंडरावाले ने एक प्रकाशक और हिन्दू नेता को क़त्ल करके खुद को मशहूर कर लिया। बिलकुल ऐसे ही जैसे बाल ठाकरे ने उत्तर भारतियों के ऊपर हमले किये और प्रसिद्ध हो ग दोनों ही बदमाश प्रवृति और विकृत मानसिकता को दर्शाते हैं।
सिख नाराज़ न हो जाएँ, इस लिए किसी ने उन्हें कुछ न कहा लेकिन वो था कौन?
एक गांव का मामूली सा ग्रंथी और वो भी सीमाई इलाके का जहाँ पर सोने और नशीले पदार्थों की तस्करी चरम पर रही है. चढ़ावा चढाने वाले भी तो ऐसे ही लोग, बाबा जी वाहेगुरु दी कृपा रही तन वापिस आ कर दोगुना चढ़ावा देंगे।
कोंग्रेस ने पंजाब में अकालिओं की शक्ति कम करने के लिए उसे ऐसी ही आज़ादी दी जैसे अमेरिका ने तालिबान को, रूस कि सत्ता के समय.
उसको अंगरक्षक मिल गए नहीं तो निरंकारिओं ने उसे मार देना था. शत्रु राष्ट्र पाकिस्तान ने मौका देखा और उसने भी उसे शाह देनी शुरू कर दी. थोड़े हथ्यार भेजे और कहा के हिन्दू मंदिरों पर कब्ज़ा कर लो, पंडितों को भगा दो, हिंदुओं को बसों कारों से निकाल कर मार दो, पैसे मैं देता हूँ तुम्हें।
जलसे हुए तो सभी मुश्किलात के लिए हिंदुओं को गाली गलोच, धमकीआं, हवाई फायर और खेल शुरू।
भिंडरावाले कि क़ाबलियत क्या थी? कभी स्कूल भी गया था या नहीं? हाँ, कहते हैं उसे गुरु ग्रन्थ साहेब पूरा ज़ुबानी याद था। तो क्या? क्या हरक़तें भी श्री गुरु ग्रन्थ साहेब के माफिक थीं? नहीं, बिलकुल नहीं।
एक सत्य तो यह भी है के अच्छे भले घरों के पढ़े लिखे नौजवान बेकार बैठे दाढ़ी खुली छोड़ कर अपनी तकदीरको कोस रहे थे क्योंके कोई काम था ही नहीं। अंत कि गरीबी थी। किसानों के पास ज़मीनें थी किन्तु बदले में उनका भी सोशन ही होता था। सोशन करने वाले सभी थे हिन्दू, मुस्लिम, सिख जिन्हे आढ़तिये कहा जाता है।
सीखी कि शुरुआत के समय अनेकों समस्त गावों ने सीखी धर्म अपना लिया था। गुरु गोबिंद सिंह के चार बेटों की हत्या के पश्चात् हिंदुओं ने अपना सब कुछ त्याग दिया था. कुछेक परिवारों में बढे भाईओं ने सिख धर्म अपना कर अपने छोटे भाई को कह दिया के वो घर कि देख भाल करे - इस वजह से कुछेक गांवों में दो चार घर हिंदुओं के रह गए और बाकी सभी सिखों के हो गए।
नखुन मॉस का रिश्ता कहते थे मुग़ल लोग हिन्दू और सिख को . बेवक़ूफ़ थे क्या वो या भिंडरावाला पाकिस्तान की शह लेकर ज़यादा बुद्धिमान हो गया था ? जो लोग सिख बनकर जंगलों में चौबीसों घंटे घोड़ों पर सवार होकर भटकते थे , उनको लंगर पहुंचते थे गाओं में बचे हुए हिन्दू . यही सोचते थे के इनमें से हमारा भी एक कहीं न कहीं इन्हीं जंगलों में भटक रहा है . पता नहीं कब मुलाकात होगी और होगी भी या नहीं . इन्हीं सिखों में वो अपने भाईओं बेटों और पतिओं की शकल तलाश करते थे. इसी वजह से मुग़ल कहा करते थे के इन दोनों में नाखून मॉस का रिश्ता है. सिखी में नए बुद्धिजीवी का प्रवेश क्या हुआ, इतिहास को ही तोड़ मरोड़ दिया गया। अपने सगे भाईओं को ही दुश्मन कहा जाने लगा।
नखुन मॉस का रिश्ता कहते थे मुग़ल लोग हिन्दू और सिख को . बेवक़ूफ़ थे क्या वो या भिंडरावाला पाकिस्तान की शह लेकर ज़यादा बुद्धिमान हो गया था ? जो लोग सिख बनकर जंगलों में चौबीसों घंटे घोड़ों पर सवार होकर भटकते थे , उनको लंगर पहुंचते थे गाओं में बचे हुए हिन्दू . यही सोचते थे के इनमें से हमारा भी एक कहीं न कहीं इन्हीं जंगलों में भटक रहा है . पता नहीं कब मुलाकात होगी और होगी भी या नहीं . इन्हीं सिखों में वो अपने भाईओं बेटों और पतिओं की शकल तलाश करते थे. इसी वजह से मुग़ल कहा करते थे के इन दोनों में नाखून मॉस का रिश्ता है. सिखी में नए बुद्धिजीवी का प्रवेश क्या हुआ, इतिहास को ही तोड़ मरोड़ दिया गया। अपने सगे भाईओं को ही दुश्मन कहा जाने लगा।
पाकिस्तान कि शह पर भिंडरावाले ने उनको मारने का ठेका ले लिया। सेण्टर बना दिया गया - श्री दरबार साहेब अमृतसर, जिसे हज़ारों हिन्दू देवी देवताओं कि तस्वीरों से सजाया हुआ था, अंदर घुसते ही ऐलान कर दिया गया "सिख एक अलग धर्म है" और तुरंत दीवारों से सब तस्वीरें साफ़। आका का हुकुम जो मिला था।
आज के बाद हिन्दू धर्म के त्यौहार और सिखों के त्यौहार अलग। हरेक त्यौहार कि तारीख में एक दिन का फर्क दाल दिया गया. यह सब किसकी शाह पर हुआ? पाकिस्तान कि शाह पर या मुस्लिम समाज कि शाह पर?
मज़ाक बना दिया गया के हिंदुओं के ३६ करोड़ देवते हैं। इनमें से एक भी कम नहीं। कहने का अर्थ तो था के किसी भी जीवित, स्थिर या अस्थिर विचार या वस्तु, जिससे भी आपकी शंका का निवारण हो और संतोष मिले उसकी पूजा करो, भक्ति करो, पूरी आज़ादी है, कोई बंधन नहीं। और ३६ करोड़ देवते हैं, भगवान् नहीं। हरेक अच्छे करम करने वाला देवता होता है , भगवन नहीं।
उज़बेक में जन्मे और अपने आप को ईरान को मानने वाले बाबर को तो जानते होंगे आप? जो १५०४ में हिंदुकुश कि पहाडयों के रास्ते काबुलपर काबिज़ हुआ और फिर खयबेर पास के रास्ते उसने १५१९ में चेनाब तक पहुंचा पानीपत कि लड़ाई के बारे में भी जानते हैं आप. बाबर, आतंक का दूसरा रूप, जो दिल्ली, आगरा, मेवार, अलवर, के रास्ते होता हुआ राजपूतों, हिंदुओं का क़त्ल करता रहा. "ऐति मार पई कुरलाने " वाले बाबा नानक और फिर श्री गुरु (अंगद, अमर दास, राम दास,अर्जन, हर गोबिंद रॉय, हर राइ, हर कृषण , तेग़ बहादुर , गुरु गोबिंद रॉय / सिंह) के नाम से अनजान नहीं होंगे। भाई मति दास, सती दास, दयाल दास को भी जानते होंगे।
दूसरी तरफ से बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाह जहाँ और औरंगज़ेब के ज़ुल्मों कि दास्तान भी भूल गया भिंडरावाला। उसकी नज़र में यह सभी लोग पाक साफ़ और हिन्दू घिनोने हो गए।
पैसे और हथयार के नशे में उसे तेग़ बहादुर कि शहीदी भी भूल गयी , यह भी भूल गया के गोबिंद सिंह जी के चार बेटों की हत्या करने वाले कौन थे. दूर फिट्टे मुंह ऐसे आदमी के।
गैर मुस्लिम औरतों के साथ बलात्कार, जननी अंगों को काटना, उनके गर्भाशय से बच्चे को खींच लेना और हत्या कर देना, उनके पेट को चीर डालना , नाक और कान काट देना , उनकी छातिओं के ऊपर अल्लाह-हूँ-अकबर लिखने वालों, बच्चों के सर कलम कर बर्छों के ऊपर टाँग देने वाले लोगों का एजेंट बन गया भिंडरावाला। यह मैं नहीं कहता, दस गुरु साहेबान के गुरूद्वारे कहते हैं। हरेक मंदिर कहता है , और हरेक आवाज़ कहती है जिसे भय से खामोश करने कि कोशिश की जाती है।
उज़बेक में जन्मे और अपने आप को ईरान को मानने वाले बाबर को तो जानते होंगे आप? जो १५०४ में हिंदुकुश कि पहाडयों के रास्ते काबुलपर काबिज़ हुआ और फिर खयबेर पास के रास्ते उसने १५१९ में चेनाब तक पहुंचा पानीपत कि लड़ाई के बारे में भी जानते हैं आप. बाबर, आतंक का दूसरा रूप, जो दिल्ली, आगरा, मेवार, अलवर, के रास्ते होता हुआ राजपूतों, हिंदुओं का क़त्ल करता रहा. "ऐति मार पई कुरलाने " वाले बाबा नानक और फिर श्री गुरु (अंगद, अमर दास, राम दास,अर्जन, हर गोबिंद रॉय, हर राइ, हर कृषण , तेग़ बहादुर , गुरु गोबिंद रॉय / सिंह) के नाम से अनजान नहीं होंगे। भाई मति दास, सती दास, दयाल दास को भी जानते होंगे।
दूसरी तरफ से बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाह जहाँ और औरंगज़ेब के ज़ुल्मों कि दास्तान भी भूल गया भिंडरावाला। उसकी नज़र में यह सभी लोग पाक साफ़ और हिन्दू घिनोने हो गए।
पैसे और हथयार के नशे में उसे तेग़ बहादुर कि शहीदी भी भूल गयी , यह भी भूल गया के गोबिंद सिंह जी के चार बेटों की हत्या करने वाले कौन थे. दूर फिट्टे मुंह ऐसे आदमी के।
गैर मुस्लिम औरतों के साथ बलात्कार, जननी अंगों को काटना, उनके गर्भाशय से बच्चे को खींच लेना और हत्या कर देना, उनके पेट को चीर डालना , नाक और कान काट देना , उनकी छातिओं के ऊपर अल्लाह-हूँ-अकबर लिखने वालों, बच्चों के सर कलम कर बर्छों के ऊपर टाँग देने वाले लोगों का एजेंट बन गया भिंडरावाला। यह मैं नहीं कहता, दस गुरु साहेबान के गुरूद्वारे कहते हैं। हरेक मंदिर कहता है , और हरेक आवाज़ कहती है जिसे भय से खामोश करने कि कोशिश की जाती है।
भिंडरावाले की नज़र में तो बाबा नानक भी पागल होगा जिसे इस्लामिक लोगों की गैर मुस्लिम के साथ हमदर्दी समझ नहीं आयी। और अकेला बेचारा बाबा नानक क्यों, पूरी लड़ी ही कह देता। लेकिन उसने कहा नहीं क्योंके इसी कि आड़ लेकर तो वो दुश्मन का साथ दे रहा था। दिखावे की शकल एक और हरकतें करने के लिए दूसरी। आज तक किसी हिन्दू ने एक छोटी सी गाली भी नहीं निकाली होगी किसी भी गुरु साहेबान के लिए, लेकिन जो गाली श्री गुरु तेग़ बहादुर जी को देकर गया है भिंडरावाला , उसका बदला लेने की जगह उसे नायक बनाने कि कोशिश क्यों कर रहा है सिख समाज।
लेकिन जो काम बाबर या औरंगज़ेब नहीं कर सका उसका ठेका अब भिंडरावाला के पास आ गया। सिख के केश में एक शैतान का जनम हो चूका था जो श्री दरबार साहिब पर काबिज़ हो चूका था।
लेकिन जो काम बाबर या औरंगज़ेब नहीं कर सका उसका ठेका अब भिंडरावाला के पास आ गया। सिख के केश में एक शैतान का जनम हो चूका था जो श्री दरबार साहिब पर काबिज़ हो चूका था।
मज़ेदार बात यह है के जब उसने अकाल तखत पर कब्ज़ा किया तो सिख धर्म कि इज़ज़त को दाग नहीं लगा किन्तु जब इस जानवर से लोगों कि सुरक्षा के लिए फ़ौज अंदर गयी तो अकाल साहेब की बेअदबी हो गयी। अगर सिख कौम इतनी ही दलेर थी तो तो उसने खुद भिंडरावाला को वहाँ से बहार क्यों नहीं निकाला? सिख धर्म के यह दो अलग अलग चेहरे क्यों? यह दो तरह कि तराज़ू क्यों?
ज़ाहिर है के इसके पीछे नफरत के भाषण काम कर रहे थे। उस समय हिंदुओं के खिलाफ भिंडरावाला के आलावा और कोई भी ज़हर नहीं फैला रहा था। "भिंडरावाला संत सिपाही, जिसने सुट्टी कौम जगाई!!!" का नारा लगा दिया गया। कौन सी सोई हुई कौम? सिख?
आज जब हम दस गुरु साहेबान की तस्वीरों के साथ भिंडरावाले कि तस्वीर को देखते हैं तो यह समझ नहीं आती के एक बदमाश को इज़ज़त दी जा रही है या दस महापुरुषों कि शरेआम बेइज़ज़ती कि जा रही है।
विदेशों में बसा हुआ सिख भाईचारा खालिस्तान के नारे लगता नहीं थकता।
१९८४ का घल्लूघारा याद रहता है किन्तु इन्हें उस टीवी निर्देशक कि याद नहीं आती जो हिंदी में कार्यक्रम देता था किन्तु उसके रोते कुरलाते और तरले लेते बच्चों के सामने उसकी हत्या कर दी गयी थी।
सीखी का "संत सिपाही" बड़े बड़े काम करके गया है। जो पर्दा न खोलें, वोही अच्छा है।
ओपेरशन ब्लैक थंडर के समय भी अनेकों लाशें मलबे के नीचे से मिली थीं। जो चार कारखाने अमृतसर में थे , वो भी डेल्ही पलायन कर गए।
तीन चार सौ साल पहले जिन व्यापारिओं को सिख गुरुओं ने अमृतसर लाकर बसाया था और सुरक्षा का वादा किया था, सिखों के अखौती ग्यारहवें गुरु ने उनको मारना काटना शुरू कर दिया। किसी गांव या कसबे में जिस किसी के पास कार या मोटर साइकिल था, उसको भी लूटा गया। अपने दौर में, हिटलर भी अपने आप को देश भक्त समझता था किन्तु जितना नुक्सान उसने अपने देश का किया - उतना फ्रांस वाले भी नहीं कर सके थे।
यही रिश्तेदारी भिंडरावाला और सीखी के दरमियान रही है।
इतनी नफरत, रोज़ कतलोंके आलावा भिंडरावाला ने पंजाब को क्या दिया? धमकियाँ, लूट मार, बदले? एक पागल कहा "मैं हिंदुओं को मार मुकाऊँगा" , सिआसत ने उसको पनाह दी, शत्रु मुल्क ने उसे पैसा और हथ्यार दिए - तमाशा १९८४ में डेल्ही में हुए दंगों के रूप में उभरा।
मारे गए बेचारे वोही हिन्दू जिन्होंने सिखी धर्म को अपनाया था , अपनों ही कि हिफाज़त करने के लिए।
कुछेक कहते हैं, "सिखों का क़त्ल हुआ है". उनके छोटे से भेजे में यह बात नहीं घुसती के सिख होने से पहले वो भी हिन्दू ही थे और कुछेक साल पहले ही पाकिस्तान से उजाड़कर हिंदुस्तान पहुंचे थे - अपने और अपनों के देश में।
गुरु की नगरी का इतना बुरा हश्र किसी सिख कि वजह से नहीं हुआ था जितना भिंडरावाला ने कर दिया।
जिन लोगों के नौजवान बेटे मारे गए उनके साथ दिल से हमदर्दी है।
जिन्होंने आतंकवाद का रास्ता अपनाया और अपनी बेवाओं को बीच मझदार में छोड़कर मरे गए, उनके परिवार वालों से सहानुभूति व्यक्त करता हूँ।
वो धर्मी फौजी, जिन्होंने गुस्से में आकर फ़ौज में बगावत की, उन्हें आतम-सर्वेक्षण कि अपील करता हूँ।
उन किस्मत के धनि लोगों को मुबारकबाद देता हूँ जिनके घरों में मुकाबलोंमें आतंकवादी मरे गए और पीछे लाखों कि नगदी छोड़ गए जिनसे बाद में उन्होंने मकान, ट्रक और ट्राले डाले और आस पड़ोस कि ज़मीनें खरीदीं।
उन पुलिस वालों को भी बधाई, जिन्होंने गरीबों के नौजवान बेटों को ज़िंदा छोड़ने के बदले पैसों के ढेर इकठे कर लिए और चाँद सालोंमें ही अमीर हो गए।
उन आतंकवादिओं को भी सलाम जिन्होंने अकाली पार्टी के प्रस्ताव को अपनाया और मिनी बसों के लाइसेंस लेकर नयी ज़िन्दगी के दौर कि शुरुआत की.
उस हरेक पंजाबी व्यक्ति के साथ हमदर्दी जिसके पारिवारिक सदस्य कि इस दौर में हत्या की गयी. उन कायर, दुष्ट और डरपोक इंसानों के दूर फिट्टे मुंह जो शत्रु राष्ट्रों के एजेंट बने जिसने पंजाब को नरक बना दिया।
धमकिओं या क़त्ल कर देने से आवाज़ें नहीं दबतीं। अगर बाबर बुद्धिमान होता तो नयी मस्जिद तैयार करवाता, राम मंदिर को मस्जिद में तब्दील न करता तो इतनी सदिओं तक हिंदुओं मुस्लिमों में क़त्ल-ओ-गारत नहीं होती। शायद सिख कौम कि स्थापना भी न होती।
अगर सिख कौम एक अलग पहचान बनाना चाहती है तो उसे इतिहास से बहुत कुछ सीखना पड़ेगा।
गुरुद्वारों में हिन्दू के खिलाफ भाषण देकर, सस्ती मशहूरी और वाह वाह कमाने वाले लोगों को विंनती है के वो खुद पर लगाम लगाएं। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब सभी के सांझे हैं. उनकी हाज़िरी में अगर आप किसी जाती या धर्म का अपमान कर रहे हैं तो अतिथि से पहले मेज़बान को बुरा लगना स्वभाविक है।
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